धर्मपाल जी के 'द ब्यूटीफुल ट्री पुस्तक' के आलोक में तिरहुत का विशेष अध्ययन
लेखक :- राजेश झा
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प्रस्तावना यह है कि भारत की शिक्षा के इतिहास पर औपनिवेशिक लेखन ने एक मिथक स्थापित किया कि भारत एक निरक्षर, शिक्षा-शून्य समाज था जिसे अंग्रेजों ने आकर सभ्य बनाया।
धर्मपाल जी ने 40 वर्षों के अभिलेखीय अनुसंधान से इस मिथक को ध्वस्त किया।
उनका केंद्रीय तर्क है कि 18वीं शताब्दी के अंत तक भारत में एक अत्यंत व्यापक, सुदृढ़ और समाज-आधारित शिक्षा व्यवस्था जीवित थी, जिसे ब्रिटिश राजस्व और शिक्षा नीति ने सुनियोजित रूप से नष्ट कर दिया।
अध्याय 1: पूर्व-औपनिवेशिक शिक्षा का स्वरूप - विलियम एडम की तिरहुत रिपोर्ट साक्ष्य के रूप में।
विलियम एडम को लॉर्ड विलियम बेंटिक ने 1835 में बंगाल और बिहार की देशी शिक्षा का सर्वे करने के लिए नियुक्त किया था। उसकी तीसरी रिपोर्ट 1838 में तिरहुत जिले का जो चित्र देती है वह धर्मपाल जी के मत का सबसे ठोस प्रमाण है।
तिरहुत के 16 थानों में उस समय 80 हिंदी पाठशालाएँ, 238 फारसी-अरबी मदरसे और दर्जनों संस्कृत टोल सक्रिय थे।
केवल हिंदी स्कूलों में ही यह थी कि- एक गाँव में तीन स्कूल, छह गाँवों में दो-दो स्कूल और पैंसठ गाँवों में एक-एक स्कूल। यह घनत्व सिद्ध करता है कि शिक्षा शहरों तक सीमित नहीं थी, गाँव-गाँव तक फैली थी।
एडम लिखता है कि सभी 80 हिंदी शिक्षक हिंदू थे जिनमें 77 कायस्थ, 2 गंधबनिक, 1 ब्राह्मण थे।
यह बताता है कि शिक्षा एक जीवित पेशा था, समाज के भीतर से ही शिक्षक आते थे। उसकी टिप्पणी है - This sufficiently shows that here also the writer-caste is almost exclusively engaged in the business of teaching common schools.
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य समावेशिता का है।
एडम आश्चर्य से दर्ज करता है कि दुसाध, पासी, लुनिया और चमार जैसी जातियों के बच्चे भी पाठशालाओं में पढ़ते हैं - the Dosad, Pashi, Luniar, &c., are comparatively numerous, and have begun here also to seek a participation in the benefits of vernacular instruction.
यह इस बात का प्रमाण है कि व्यवस्था जन्म-आधारित बंद व्यवस्था नहीं थी, बल्कि सर्व समावेशी और सर्व सम्पर्की दृष्टि से खुली हुई थी।
भाषा के स्तर पर भी एडम दर्ज करता है कि तिरहुत में हिंदी के साथ-साथ तिरहुतिया भी शिक्षा और पत्राचार की भाषा थी - Trihutiya in addition to Hindi prevails as the language of conversation, of verbal instruction, and of correspondence.
यह स्थानीय भाषा तिरहुतिया-मैथिली के सम्मान का प्रमाण है, जो मैकाले की अंग्रेजी-प्रधान नीति में नष्ट हो गया।
फारसी स्कूलों की स्थिति देखिए।
फारसी स्कूलों में 569 छात्र थे जिनमें 126 मुसलमान और 443 हिंदू थे। हिंदुओं में 349 कायस्थ, 30 ब्राह्मण, 22 राजपूत थे।
अर्थात हिंदू समाज भी फारसी पढ़कर प्रशासन में भाग ले रहा था क्योंकि व्यावहारिक रूप से फारसी रोजगारोन्मुख शिक्षा थी।
अध्याय 2: शिक्षा का अर्थशास्त्र - समाज कैसे चलाता था?
धर्मपाल जी ने स्थापित किया कि ये पाठशालाएँ सरकार से नहीं चलती थीं। इन्हें गाँव की जमीन से हिस्सा मिलता था - मद्रास में इसे मन्यम कहा जाता था, बिहार में अग्रहार और माफी। गाँव के किसान अपनी उपज का एक छोटा हिस्सा पाठशाला और मंदिर दोनों के लिए देते थे।
शिक्षक को नगद वेतन नहीं, बल्कि गाँव से अनाज, भोजन और कभी-कभी जमीन मिलती थी। एडम की रिपोर्ट में भी एक शिक्षक gratuitous instruction देता था और पाँच शिक्षक अपने 22 छात्रों को भोजन भी देते थे।
यह समाज-आधारित अर्थशास्त्र ही इसकी मजबूती था। जब तक गाँव समृद्ध था, पाठशाला जीवित थी।
अध्याय 3: विनाश की प्रक्रिया - कैसे उखड़ा सुंदर रमणीय वृक्ष!
धर्मपाल जी के अनुसार विनाश तीन चरणों में हुआ।
पहला, राजस्व बंदोबस्त।
1793 के स्थायी बंदोबस्त और बाद के रैयतवाड़ी बंदोबस्त में अंग्रेजों ने उन सभी माफी और इनाम की जमीनों को जब्त कर लिया जो पाठशालाओं, टोलों और मदरसों को चलाती थीं। जब आर्थिक आधार छिना, तो स्कूल बंद होने लगे।
दूसरा, 1835 का मैकाले का विवरण-पत्र।
इसमें कहा गया कि सरकार का सारा पैसा केवल अंग्रेजी शिक्षा पर खर्च होगा। देशी पाठशालाओं को कोई सहायता नहीं दी जाएगी। एडम ने खुद सिफारिश की थी कि इन देशी स्कूलों को किताबें और थोड़ा अनुदान देकर सुधारा जाए, पर उसकी रिपोर्ट को रद्दी में डाल दिया गया।
तीसरा, नई व्यवस्था का महँगा और विदेशी होना।
नया सरकारी स्कूल गाँव से 10-15 कोस दूर, फीस वाला, अंग्रेजी पढ़ाने वाला, नौकरी के लिए। जबकि पुराना स्कूल गाँव के अंदर, मुफ्त, हिसाब-किताब और रामायण पढ़ाने वाला, जीवन के लिए था। गरीब किसान नए स्कूल तक पहुँच ही नहीं सका।
तिरहुत का आँकड़ा इसका प्रमाण है।
एडम के समय तिरहुत में 80 हिंदी स्कूलों में औसत 6.3 छात्र थे, पर वे 80 स्कूल थे। 1880 तक लेइटनर जब पंजाब का सर्वे करता है तो कहता है कि हजारों देशी स्कूल बंद हो चुके हैं और उनकी जगह कुछ सौ सरकारी स्कूल ही हैं।
अध्याय 4: गांधीजी का रूपक और धर्मपाल जी द्वारा पुष्टि।
1931 में गोलमेज सम्मेलन में गांधीजी ने कहा था - The beautiful tree perished.
धर्मपाल जी ने 50 साल बाद उसी पेड़ की जड़ों को आर्काइव्स में खोजा। उन्होंने दिखाया कि वह पेड़ काल्पनिक नहीं था। मद्रास प्रेसीडेंसी में 1822 में मुनरो के आँकड़ों के अनुसार 11,575 स्कूल और 1,57,195 छात्र थे। बंगाल में 1 लाख से अधिक स्कूल थे।
यह संख्या उस समय इंग्लैंड से भी अधिक थी। इंग्लैंड में तब तक अनिवार्य शिक्षा नहीं थी, जबकि भारत में समाज-आधारित शिक्षा थी।
अध्याय 5: तिरहुत मॉडल - समाज-आधारित शिक्षा की आंतरिक संरचना।
तिरहुत का उदाहरण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मिथिलांचल का हृदय है, जहाँ संस्कृत विद्या का सबसे बड़ा केंद्र था। एडम की रिपोर्ट कहती है -
in that division of the Tirhoot district which contains the greatest number of schools of Hindu learning there are no vernacular schools at all.
इसका अर्थ यह नहीं कि वर्नाक्यूलर शिक्षा कमजोर थी, बल्कि यह कि समाज ने दो समानांतर व्यवस्थाएँ बना रखी थीं।
एक उच्च-शास्त्रीय व्यवस्था - संस्कृत टोल जहाँ व्याकरण, ज्योतिष, न्याय, स्मृति पढ़ाई जाती थी। एडम के अनुसार तिरहुत में व्याकरण के 127, ज्योतिष के 53, न्याय के 16 छात्र थे।
दूसरी व्यावहारिक व्यवस्था - हिंदी पाठशाला और फारसी मकतब।
हिंदी पाठशाला की चार सीढ़ियाँ थीं, जिसे एडम विस्तार से दर्ज करता है। पहली - जमीन पर लिखना, दूसरी - लकड़ी की पट्टी पर, तीसरी-चौथी - पीतल की थाली पर खड़िया से लिखना। बिहार में ताड़-पत्र का प्रयोग नहीं होता था, wooden-board and brazen-plate are exclusively employed. यह स्थानीय नवाचार था।
पाठ्यक्रम क्या था?
एडम स्पष्ट लिखता है - In 36 schools commercial accounts only, in 20 schools agricultural accounts only, in 229 schools both commercial and agricultural accounts are taught.
अर्थात शिक्षा का 95% उद्देश्य व्यावहारिक हिसाब था।
बाकी 5% में Dan Lila, Dadhi Lila, Sudam Charitra, Ram Janma by Tulasi Das, Sundar Kanda पढ़ाया जाता था। यह धर्म और नीति से जुड़ा साहित्य था, मैकाले की तरह विदेशी साहित्य नहीं।
शिक्षक की आय का मॉडल देखिए।
तिरहुत में कोई भी शिक्षक पूरी तरह मुफ्त नहीं पढ़ाता था, पर कोई भी सरकारी वेतनभोगी भी नहीं था। वे गाँव से सीधे जुड़े थे। यह गुरु-शिष्य परंपरा नहीं, बल्कि समाज-सेवा परंपरा थी। गाँव का बनिया, किसान अपना बेटा भेजता था, बदले में गुरु को अनाज देता था।
धर्मपाल जी इसी को Beautiful Tree कहते हैं - जिसकी जड़ें गाँव की अर्थव्यवस्था में थीं, तना समाज के सहयोग में था, और पत्ते हर बच्चे तक पहुँचते थे।
अध्याय 6: ध्वंस का लेखा-जोखा - आँकड़ों में गिरावट।
धर्मपाल जी ने मद्रास प्रेसीडेंसी के आँकड़ों से सिद्ध किया कि 1822 में 11,575 स्कूल थे, 1880 तक वे घटकर 2,500 रह गए। इसी तरह बंगाल में 1835 में एडम ने 1,00,000 के आसपास स्कूल अनुमानित किए थे, 1901 की जनगणना में सरकारी स्कूल केवल 8,000 थे।
तिरहुत में भी यही हुआ।
1838 में 80 हिंदी स्कूल थे, 1872 की पहली नियमित जनगणना में दरभंगा जिले में देशी स्कूलों की संख्या 40 से भी कम रह गई। फारसी स्कूल तो 1857 के बाद लगभग समाप्त ही हो गए, क्योंकि अंग्रेजी ने फारसी को कचहरी की भाषा से हटा दिया।
एडम ने सुझाव दिया था कि सरकार हर थाने में एक आदर्श पाठशाला बनाए और देशी शिक्षकों को प्रशिक्षण दे।
सरकार ने इसके उलट किया - 1844 में लॉर्ड हार्डिंग ने घोषणा की कि सरकारी नौकरी केवल अंग्रेजी स्कूलों के पास छात्रों को मिलेगी। इससे फारसी और हिंदी पाठशालाओं का रोजगार से संबंध टूट गया।
अध्याय 7: दो शिक्षा-दृष्टियों का संघर्ष।
मैकाले ने 1835 में कहा था - भारत में जो साहित्य है वह यूरोप के एक अच्छे पुस्तकालय की एक अलमारी के बराबर भी नहीं। इसलिए अंग्रेजी पढ़ाओ।
धर्मपाल इसका उत्तर एडम से देते हैं।
एडम ने पाया कि तिरहुत के स्कूलों में कोई छपी किताब नहीं थी, पर मौखिक परंपरा जीवित थी। राम जन्म तुलसीदास कृत और सुंदर कांड बच्चे कंठस्थ करते थे।
यह रटंत नहीं, स्मृति-प्रशिक्षण था।
मैकाले की शिक्षा का उद्देश्य क्लर्क बनाना था - बाबू वर्ग। तिरहुत की शिक्षा का उद्देश्य आत्मनिर्भर बनाना था - हिसाबी, किसान, व्यापारी।
एक विदेशी राज्य के लिए उपयोगी, दूसरा स्वदेशी समाज के लिए उपयोगी।
गांधीजी ने इसी भेद को गोलमेज सम्मेलन में पकड़ा।
उन्होंने कहा कि अंग्रेजों ने जड़ को खोदकर छोड़ दिया। धर्मपाल ने दिखाया कि जड़ राजस्व नीति थी। जब जमीन छिनी, तो पेड़ सूखा।
अध्याय 8: समावेशिता का वास्तविक अर्थ - धर्मपाल की सबसे बड़ी खोज।
औपनिवेशिक इतिहासकार कहते थे कि भारतीय शिक्षा केवल ब्राह्मणों के लिए थी। धर्मपाल ने मुनरो के 1822-26 के आँकड़ों से दिखाया कि मद्रास में:
- ब्राह्मण छात्र - 23%
- क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र - 65%
- अन्य जातियाँ, मुसलमान - 12%
तिरहुत में भी एडम कहता है कि दोसाध, पासी, लुनिया - जो आज दलित वर्ग में हैं - वे भी पाठशाला में आ रहे थे।
यह 1830 की बात है, जब अमेरिका में गुलामी थी और इंग्लैंड में मजदूरों के बच्चों के लिए स्कूल नहीं थे।
धर्मपाल जी का तर्क है कि समावेशिता का अर्थ आज के आरक्षण जैसा नहीं था, पर समाज के निचले स्तर तक शिक्षा की पहुँच थी, जो 1900 के बाद सरकारी स्कूलों में और भी कम हो गई, क्योंकि फीस लग गई।
उपसंहार - पुनर्स्थापना का मार्ग।
इन तथ्यों से यह स्थापित होता है कि:
1. अठारहवीं शताब्दी में तिरहुत में एक जीवित, व्यापक, गाँव-आधारित शिक्षा व्यवस्था थी, जिसके 80 हिंदी और 238 फारसी स्कूल इसके प्रमाण हैं।
2. यह व्यवस्था राज्य द्वारा नहीं, समाज द्वारा पोषित थी - जमीन, अनाज और श्रम से।
3. यह व्यवस्था पूर्णतः समावेशी थी, जैसा कि दोसाध-पासी के प्रवेश से दिखता है।
4. ब्रिटिश राजस्व और शिक्षा नीति ने इस व्यवस्था के आर्थिक और वैधता के आधार को नष्ट किया, जिससे साक्षरता घटी, न कि बढ़ी।
5. इसलिए धर्मपाल जी का मत सही है कि भारत का नुकसान अंग्रेजी शिक्षा के आने से नहीं, बल्कि देशी शिक्षा के उजड़ने से हुआ।
आज की नई शिक्षा नीति 2020 जब मातृभाषा और स्थानीय ज्ञान की बात करती है, तो वह उसी Beautiful Tree को फिर से लगाने की कोशिश है, जिसे गांधीजी ने देखा था और धर्मपाल जी ने अभिलेखों में सिद्ध किया।
( पोस्ट में लिखी बातों को इस संदर्भ ग्रंथ सूची के आलोक में देखा जा सकता है)
1. William Adam, Reports on Vernacular Education in Bengal and Behar (1835, 1836, 1838), Chapter 1 Section 5 & 6, District of Tirhoot.
2. Dharampal, The Beautiful Tree: Indigenous Indian Education in the Eighteenth Century (1983), Other India Press.
3. Thomas Munro, Report on Indigenous Education in Madras Presidency (1822-26).
4. G.W. Leitner, History of Indigenous Education in Punjab (1882).
5. M.K. Gandhi, Speech at Round Table Conference, 20 October 1931, London.
6. National Archives, UK - Revenue Proceedings, Tirhoot District, 1793-1830.
लेखक :- राजेश झा
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