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पीडाएँ परिवर्तन नहीं लातीं, परिवर्तन लाती है जीवनी शक्ति

अन्धकार और मलिनता में पनपने वाले, छिपकर निकलने वाले तथा झुण्ड को शक्ति मानने वाले वितृष्णा के पर्याय, जब तथाकथित क्रान्ति के प्रतीक बनने लगें, तो यह समझना कठिन नहीं रह जाता कि क्रान्ति कितनी निर्विचार है।  पीडाएँ परिवर्तन नहीं लातीं, परिवर्तन लाती है जीवनी शक्ति, वह जीवनी शक्ति जो पवित्रता और प्रकाश में निहित है, कम से कम मनुष्य के लिये। आन्दोलन के लिये असन्तोष ही काफी नहीं होता, उसको कोई आदर्श चाहिए। तिलचट्टे कौन सा आदर्श अपनायेंगे अभी यह साफ नहीं। वैसे आदर्श कहते हैं दर्पण को और दर्पण चमकता है प्रकाश में। किन्तु तिलचट्टे ? वे तो प्रकाश सह नहीं सकते, उसमें मरने लगते हैं। फिर इनके आन्दोलन का क्या होगा। जो भी हो, मैं तो यह देख-देख कर चकित हूँ कि भारत की युवा चेतना को जिस अनर्गल कथन का स्वस्थ प्रतिवाद करना था उसको उसने अपना राजनैतिक प्रस्थान बनाने की चेष्टा प्रारम्भ की है। वह भी उनके बल पर, जिन्हें संसदीय भाषा में ‘विपक्ष’ न कहा जाये तो वे स्वयं भी नहीं जानते कि उनका पक्ष क्या है।  राष्ट्र-निर्माण के लिए नौकरी नामक स्वर्णिम अवसर के लिए लालायित ये भीड़ कितनी आन्दोलन-क्षम है और इस...

गृह में वीरता और रणक्षेत्र में सटक सीताराम।

केतकी सिंह ने ग़लत किया।  Share बिना ट्रेनिंग दिए ट्रेनर बना कर फील्ड में उतार देने से यही परिणाम मिलता है। परंतु केतकी सिंह से पाग की रक्षा हो गई हो तो कृपया इधर ध्यान देंगे- १. झंझारपुर में चौपाल तरुण की नृशंस हत्या मुसलमानों द्वारा कर दी जाती है। २. अलीनगर में ही यादव बच्ची को मुसलमान उठा ले जाता है। ३. हरलाखी में विवाहित दलित युवती का मुसलमानों द्वारा मान मर्दन होता है। ४. दरभंगा सदर में राम बारात पर मुसलमानी भीड़ द्वारा पत्थरबाजी होती है। ५. बेनीपट्टी में मुसलमान ता-जबरदस्ती हिन्दू घर में घुस जाता है। https://www.facebook.com/share/r/1CZz69Zipx/ कितने गिनाऊँ! इन घटनाओं के समय मिथिला का मान, मिथिला का सम्मान, मिथिला की प्रतिष्ठा, मिथिला का पाग जब उछाला जा रहा होता है तब हमलोग कहाँ सोए रहते हैं! उन परिस्थितियों में हमें साँप क्यों सूंघ लेता है, तब हम रण में उतरने को प्रस्तुत क्यों नहीं होते? इस पर भी थोड़ा सोचा जाए देवियों और सज्जनों। अपने भीतर की कुंठा से बाहर निकलेंगे तो आँखों के उपर हीनता बोध का जो पर्दा पड़ा है वह हटेगा और देख पाएंगे कि शत्रुदल किस तैयारी में है! स्वयं को स्...

मुग़ल काल में परिवार के सदस्यों की हत्याओं (जो बाप/भाई का नहीं हुआ वो हिंदू का कैसे होगा)

बाबर परिवार संघर्ष  शीर्षक: 🕌 "मुग़ल साम्राज्य की नींव और परिवार में खून का खेल – बाबर युग" विवरण: बाबर ने सत्ता के लिए अपने रिश्तेदारों को हटाया। उनके पुत्र हुमायूँ से संघर्षरत संबंध रहे। परिवार के अंदर अस्थिरता और अविश्वास की शुरुआत यहीं से हुई। 📜 मुख्य बात: मुग़ल वंश की सत्ता की नींव रिश्तों के ख़ून से सनी हुई थी। ⚔️ 2. हुमायूँ काल हत्या व संघर्ष  शीर्षक: 🕋 "हुमायूँ का संघर्ष – भाईयों से विश्वासघात और सत्ता की होड़" विवरण: हुमायूँ के भाइयों — कामरान, हिंदाल और अस्करी ने उनके विरुद्ध बगावत की। हुमायूँ को अपने ही भाइयों से जीवनभर संघर्ष करना पड़ा। अंततः परिवारिक बगावत ने हुमायूँ को निर्वासन में धकेल दिया। 📜 मुख्य बात: भाईयों की महत्वाकांक्षा ने हुमायूँ का साम्राज्य खो दिया। 👑 3. अकबर काल हत्या व साज़िश  शीर्षक: 🦚 "अकबर महान – लेकिन राजसत्ता के लिए रक्तपात से अछूता नहीं" विवरण: अकबर ने सत्ता स्थिर करने के लिए अपने चाचा-भतीजों को मृत्युदंड दिया। राजकुमार मिर्ज़ा हाकिम (भाई) के साथ टकराव। अंदरूनी विद्रोह को दबाने में अनेक परिवारजन मारे गए। 📜 मुख्य बात...

अनुसूचित जाति समूहों पर पॉलिटिकल इस्लाम के कारिंदों की कुदृष्टि रहती है।

आर्थिक तथा सामाजिक रूप से कमजोर तथा राजनीतिक रूप से परिधि पर रहनेवाले अनुसूचित जाति समूहों पर इस पॉलिटिकल इस्लाम के कारिंदों की कुदृष्टि रहती है।  Share कभी वामपंथियों द्वारा स्थापित झूठे ऐतिहासिक तथ्यों की चर्चा करते हुए इन्हें सांत्वना देकर तो कभी भारतीयता के उभार को पुनः सामंतवादी शक्तियों के रूप में परिभाषित कर यह पॉलिटिकल इस्लाम अनुसूचित जाति के हमारे बंधु-भगिनियों के मन-मस्तिष्क को प्रदूषित करता है। इस कार्य के लिए धन की व्यवस्था बड़े-बड़े धनी इस्लामी व्यक्तियों तथा समूहों के द्वारा की जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में मुस्लिम बस्तियों में रात-रात भर चलने वाली मजलिसें तथा बैठकें पॉलिटिकल इस्लाम को प्रचार-प्रसार देने का एक प्रकल्प है। सकुचाया हिन्दू समाज ऐसी गतिविधियों को देखता है पर स्वभाववश इससे दृष्टि फेर लेता है। पॉलिटिकल इस्लाम के खतरे से बचने के लिए अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाने होंगे। आपका तो नहीं जानता परंतु अपने क्षेत्र की रक्षा हेतु मैं तैयार हूँ। छोड़ेंगे नहीं जबतक तोड़ेंगे नहीं। आभार:- https://www.facebook.com/share/1A9KFWX3G9/

समाज सहयोग से संघ शताब्दी यात्रा सगम बनी- दत्तात्रेय

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ : शताब्दी यात्रा

 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ : शताब्दी यात्रा 1 संघ : कार्य, विस्तार एवं उद्देश्य संघ की स्थापना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 27 सितम्बर 1925 (विजयादशमी, विक्रम संवत् 1982) को हुई। इसका उद्देश्य सम्पूर्ण हिन्दू समाज का संगठन था। तब से सहयोग और सहभागिता के बल पर संघ का कार्य निरंतर बढ़ता गया है। प्रतिदिन चलने वाली शाखाओं के माध्यम से बालक, युवा और प्रौढ़ अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन अनुभव करते हैं, जिससे समाज में संघ की शक्ति और स्वीकृति सतत बढ़ रही है। आज 100 वर्ष की इस यात्रा ने समाज में उत्सुकता जगाई है कि लोग संघ कार्य को जानें और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उससे जुड़ें। डॉ. हेडगेवार जन्मजात देशभक्त थे। अंग्रेजों की गुलामी उन्हें गहरी चुभती थी, पर वह मानते थे कि केवल स्वतंत्रता प्राप्त करना पर्याप्त नहीं है। उन्होंने सोचा कि भारत गुलाम क्यों बना, इसका मूल कारण खोजकर उसका समाधान करना होगा। आत्मजागृति, स्वाभिमान, एकता, अनुशासन और राष्ट्रीय चरित्र निर्माण को उन्होंने आवश्यक माना। इसी उद्देश्य से स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहते हुए भी उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ...

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शताब्दी वर्ष 2025

 संघ शताब्दी के निमित्त लेखन हेतु महत्वपूर्ण विषय-बिंदु (संदर्भ : परमपूज्य सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत जी द्वारा 26–28 अगस्त 2025 को दिल्ली में आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला ‘100 वर्ष की संघ यात्रा – नए क्षितिज’ के अंतर्गत प्रदत्त उद्बोधन।) डॉ. हेडगेवार और संघ "डॉ. हेडगेवार जन्मजात देशभक्त थे। बचपन से ही यह चिंगारी उनके मन में थी।“ “संघ संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार सहित अनेक संघ के पदाधिकारी स्वतंत्रता आंदोलन में सहभागी रहे हैं।“ "डॉ. साहब कोलकाता गए, मेडिकल की पढ़ाई की और अनुशीलन समिति से संबंध भी स्थापित किया। त्रिलोक्यानाथ चक्रवर्ती, रासबिहारी बोस की पुस्तकों में उनका ज़िक्र आता है। उनका कोड नाम ‘कोकेन’ था।" “संघ का बीजारोपण वास्तव में कई वर्ष पहले हो चुका था, लेकिन 1925 की विजयादशमी के बाद उन्होंने इसकी औपचारिक घोषणा की।“ संघ का उद्देश्य : हिन्दू समाज का संगठन “संपूर्ण समाज का संगठन। संपूर्ण हिन्दू समाज का संगठन। हिन्दू कहने से यह अर्थ नहीं है कि हिन्दू वर्सेस ऑल, ऐसा बिल्कुल नहीं है। ‘हिन्दू’ का अर्थ है ‘समावेशी’।“ “जब हम हिंदू राष्ट्र कहते हैं तो किसी को छोड़ रहे ...