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Showing posts from May, 2026

झारखंड के आदिवासी इलाकों में चर्च की बढ़ती संख्या: श्री चंपई सोरेन

*चंपई सोरेन के फेसबुक वाल से* Share झारखंड के आदिवासी इलाकों में चर्च की बढ़ती संख्या पर मेरे बयान से काफी हंगामा हुआ। अपना धर्म बदल चुके कई लोग इस बात से परेशान हैं कि मैने सिर्फ चर्च की बात की, मंदिरों की नहीं। चलिए, आज इस मुद्दे पर विस्तार से बात करते हैं।  झारखंड के अधिकतर गांवों में आदिवासी-मूलवासी एक साथ रहते हैं। हमारे गांवों में हजारों सालों से जाहेरस्थान/ सरना स्थल/ देशाउली/ मांझी थान है और सनातन समाज के मंदिर भी, जिनमें मूलवासी पूजा करते हैं। आदिवासी- मूलवासी दोनों समुदाय एक दूसरे के पूजा स्थलों में सिर झुकाते हैं, एक-दूसरे के पर्व - त्योहारों में शामिल होते हैं और दोनों सबकी आस्था का सम्मान करते हैं।  इसके अलावा दिउड़ी मंदिर, रंकिणी मंदिर जैसे कई मंदिर हैं, जहाँ आदिवासी समाज के पाहन पुजारी की भूमिका में होते हैं, और सनातनी लोग भी वहाँ पूजा करते हैंं। ठीक उसी प्रकार, हम भी उनके पर्व-त्योहारों में शामिल होते हैं। लेकिन एक दूसरे के धार्मिक स्थलों एवं परंपराओं का यह परस्पर सम्मान हमारी आस्था, हमारी जीवन शैली को कभी नहीं बदलता।  हम आदिवासी पेड़ के नीचे बैठ कर पूजा क...

भारतीय इतिहास के छह स्वर्णिम पृष्ठ- वीर सावरकर।

आधुनिक इतिहास के प्रारंभ में ही भारत पर मुसलमानों द्वारा किए गए लगातार आक्रमणों में जो सहस्त्रों युद्ध हुए उनमें द्विमुखी संघर्ष होना हिन्दू राष्ट्र के इतिहास की अभूतपूर्व घटना थी। Share मुसलमानों से पूर्व ऐतिहासिक काल में हिन्दुस्थान पर शक, यवन आदि के जो परराष्ट्रीय आक्रमण हुए उन सभी का मुख्य उद्देश्य हिन्दुस्थान पर अपनी राजसत्ता मात्र स्थापित करना था। इस राजनीतिक उद्देश्य के अतिरिक्त उनके आक्रमणों का कारण कोई धार्मिक सांस्कृतिक शत्रुता नहीं थी। परंतु इस नए इस्लामिक शत्रु के आक्रमण के पीछे हिन्दू राष्ट्र की राजसत्ता को ध्वस्त कर संपूर्ण हिन्दुस्थान पर मुस्लिम आधिपत्य स्थापित करने के साथ-साथ , जो इसके पूर्व के शत्रुओं को स्वप्न में भी नहीं सूझी थी, ऐसी एक भयावह धार्मिक महत्वाकांक्षा भी धधक रही थी। राजकीय महत्वकांक्षा की अपेक्षा कई गुना अधिक प्रचंड उनकी धार्मिक महत्वाकांक्षा का उत्साह हिन्दू राष्ट्र का जीवनप्राण कहलाने वाले हिन्दू धर्म तथा हिन्दुत्व को नष्ट करने तथा इस्लाम को तलवार के जोर से हिन्दुओं पर लादने के लिए उनके आक्रमण को सतत उत्तेजना देता रहा और इस हेतु समस्त एशिया महाद्वीप के...

पीडाएँ परिवर्तन नहीं लातीं, परिवर्तन लाती है जीवनी शक्ति

अन्धकार और मलिनता में पनपने वाले, छिपकर निकलने वाले तथा झुण्ड को शक्ति मानने वाले वितृष्णा के पर्याय, जब तथाकथित क्रान्ति के प्रतीक बनने लगें, तो यह समझना कठिन नहीं रह जाता कि क्रान्ति कितनी निर्विचार है।  पीडाएँ परिवर्तन नहीं लातीं, परिवर्तन लाती है जीवनी शक्ति, वह जीवनी शक्ति जो पवित्रता और प्रकाश में निहित है, कम से कम मनुष्य के लिये। आन्दोलन के लिये असन्तोष ही काफी नहीं होता, उसको कोई आदर्श चाहिए। तिलचट्टे कौन सा आदर्श अपनायेंगे अभी यह साफ नहीं। वैसे आदर्श कहते हैं दर्पण को और दर्पण चमकता है प्रकाश में। किन्तु तिलचट्टे ? वे तो प्रकाश सह नहीं सकते, उसमें मरने लगते हैं। फिर इनके आन्दोलन का क्या होगा। जो भी हो, मैं तो यह देख-देख कर चकित हूँ कि भारत की युवा चेतना को जिस अनर्गल कथन का स्वस्थ प्रतिवाद करना था उसको उसने अपना राजनैतिक प्रस्थान बनाने की चेष्टा प्रारम्भ की है। वह भी उनके बल पर, जिन्हें संसदीय भाषा में ‘विपक्ष’ न कहा जाये तो वे स्वयं भी नहीं जानते कि उनका पक्ष क्या है।  राष्ट्र-निर्माण के लिए नौकरी नामक स्वर्णिम अवसर के लिए लालायित ये भीड़ कितनी आन्दोलन-क्षम है और इस...