भारतीय इतिहास के छह स्वर्णिम पृष्ठ- वीर सावरकर।
आधुनिक इतिहास के प्रारंभ में ही भारत पर मुसलमानों द्वारा किए गए लगातार आक्रमणों में जो सहस्त्रों युद्ध हुए उनमें द्विमुखी संघर्ष होना हिन्दू राष्ट्र के इतिहास की अभूतपूर्व घटना थी।
मुसलमानों से पूर्व ऐतिहासिक काल में हिन्दुस्थान पर शक, यवन आदि के जो परराष्ट्रीय आक्रमण हुए उन सभी का मुख्य उद्देश्य हिन्दुस्थान पर अपनी राजसत्ता मात्र स्थापित करना था।
इस राजनीतिक उद्देश्य के अतिरिक्त उनके आक्रमणों का कारण कोई धार्मिक सांस्कृतिक शत्रुता नहीं थी।
परंतु इस नए इस्लामिक शत्रु के आक्रमण के पीछे हिन्दू राष्ट्र की राजसत्ता को ध्वस्त कर संपूर्ण हिन्दुस्थान पर मुस्लिम आधिपत्य स्थापित करने के साथ-साथ , जो इसके पूर्व के शत्रुओं को स्वप्न में भी नहीं सूझी थी, ऐसी एक भयावह धार्मिक महत्वाकांक्षा भी धधक रही थी।
राजकीय महत्वकांक्षा की अपेक्षा कई गुना अधिक प्रचंड उनकी धार्मिक महत्वाकांक्षा का उत्साह हिन्दू राष्ट्र का जीवनप्राण कहलाने वाले हिन्दू धर्म तथा हिन्दुत्व को नष्ट करने तथा इस्लाम को तलवार के जोर से हिन्दुओं पर लादने के लिए उनके आक्रमण को सतत उत्तेजना देता रहा और इस हेतु समस्त एशिया महाद्वीप के लाखों मुसलमान आक्रामक विभिन्न राष्ट्रों से निकलकर हिन्दुस्थान पर सदियों तक निरंतर आक्रमण करते रहे।
ई सन 711 में अरबी मुसलमान सेनापति मोहम्मद बिन कासिम ने 50000 की विशाल सेना लेकर सिंध प्रांत पर प्रथम बड़ा आक्रमण किया।
उस समय सिंध पर वैदिक धर्म अभिमानी राजा दाहिर का राज्य था।
सारांश यह है कि सिंध में बहुसंख्यक जनता वैदिक धर्म को माननेवाले हिंदुओं की ही थी।
शेष अल्पसंख्यक बौद्ध थे।
वैदिक हिंदुओं के राज्य पर परधर्मीय एवं परकीय मुसलमान कहलाने वाले लोगों का आक्रमण देखकर इन भारतीय बौद्धों को अतीव आनंद हुआ।
अरबी मुसलमान के उस सेनापति ने आक्रमण के पहले झोंके में जैसे ही सिंधु में महत्वपूर्ण देवल नमक सिंधुद्वार-बंदरगाह को दाहिर राजा के हाथ से छीन कर जीता वैसे ही वहां स्थित बौद्ध नेताओं ने आगे बढ़कर उस परकीय सेनापति का स्वागत किया और कहा कि दाहिर के समान वैदिक धर्मीय राजा और उसके लोगों से हमारा कोई संबंध नहीं है।
हमारा और उनका धर्म अलग-अलग है।
हमारे बौद्ध गुरु ने अहिंसा व्रत की पक्की शिक्षा दी है।
हम शस्त्र धारण कर राज्यों के संघर्ष में हिस्सा नहीं लेते। जो विजयी होकर राजा बनेगा फिर वह चाहे कोई भी हो ऐहिक व्यवहार में हम उसकी ही आज्ञा मानते हैं।
अब आप विजयी हुए हैं तो आप ही हमारे राजा हैं।
इसलिए हम लोग दाहिर की सशस्त्र सेना में सम्मिलित हो जाएंगे अथवा उससे मिल जाएंगे ऐसी कुशंका को आप अपने मन में ना रखें और आप हम बौद्धों को किसी प्रकार का कष्ट ना दें।
शरणागति के लिए की गई बौद्धों की उक्त समर्पण सूचक विनती पर राजनीति कुशल धूर्त मोहम्मद बिन कासिम ने कुछ समय तक के लिए उन्हें अभय दान दे दिया।
देवल के बंदरगाह पर मुसलमान के अधिकार की सूचना पाते ही दाहिर अपनी सशस्त्र सेना के साथ उनका सामना करने के लिए समरांगण में आ डटा।
मोहम्मद बिन कासिम भी देवल के आसपास की सिंध की भूमि पर अपना अधिकार करते हुए आगे की ओर बढ़ चला।
इस आक्रमण का वृतांत लिखने वाले मुसलमान इतिहासकारों ने लिखा है कि सिंध प्रांत पर विजय प्राप्त करके आगे बढ़ती हुई कासिम की सेन को उस प्रदेश के दुर्गम मार्गों की जानकारी देने, सेना को स्थान-स्थान पर रसद पहुँचाने और दाहिर की सेना के सभी आवश्यक रहस्य बताने में सिंध के बौद्धों और उनके भिक्षुओं ने सभी प्रकार की संभव सहायता दी।
अंत में ब्राह्मणवाद नामक स्थान पर दोनों सेना की मुठभेड़ हुई।
हिंदुओं ने जमकर सामना किया।
उस समय यद्यपि मुसलमान सेना के पास तोप नहीं थी तथापि एक प्रकार का ऐसा दूर तक मार करने वाला अस्त्र था जो हिंदुओं के पास नहीं था।
इस कारण हिंदुओं का बल कम पड़ने लगा।
दाहिर की सेना में कुछ अरबी मुसलमान सैनिक भी थे। इस युद्ध में उनकी भी कुछ टुकड़ियाँ लड़ रही थी।
कासिम की सेना से दाहिर की सेना का सामना होते ही उन किराए के अरबी सैनिकों ने दाहिर को स्पष्ट रूप से यह संदेश भेज दिया कि सेनापति कासिम अरबी मुसलमान है।
हम भी मुसलमान हैं।
यह धर्म युद्ध है इसलिए तुम जैसे हिंदू काफिर की ओर से हम कासिम के विरुद्ध युद्ध नहीं करेंगे।
ऐसा कहकर उन्होंने दाहिर की ही हिंदू सेना पर धावा बोल दिया।
शत्रु पक्ष के लोगों पर भी विश्वास रखने की हिंदुओं की इस असावधानी का दुष्परिणाम आगे भी जिस-जिस राजा ने मुसलमान सेना पाली उन सभी को भोगना पड़ा है।
राजा दाहिर फिर भी टक्कर लेता रहा।
वह हाथी पर सवार होकर अपने शौर्य की चरम सीमा प्रकट करते हुए घमासान युद्ध करता रहा।
लेकिन जब लड़ते-लड़ते रणभूमि में मर गया तो हिंदू सेना में भगदड़ मच गई और मुस्लिम सेना उसका पीछा करते हुए नगर में घुस पड़ी।
राजा दाहिर के वीरगति पाने की सूचना मिलते ही उसकी तेजस्विनी रानी ने सैकड़ो हिंदू वीरांगनाओं के साथ अग्नि की प्रचंड धधकती हुई चिताओं में कूद कर जौहर का वरण किया।
क्षात्र धर्म अपनी सीमा तक पहुंच गया।
रानी तथा अन्य कुलीन ललनाओं को पकड़कर दासी बनाने की शत्रु की लालसा बहुलांस में धूल में मिल गई।
फिर भी उस भीषण कोलाहल में राजा दाहिर की दो राज पुत्री सूर्य देवी और परिमल देवी नगर में घुस आए मुसलमान के हाथों लग ही गए।
मोहम्मद बिन कासिम ने हारे हुए समस्त सैनिकों और नागरिकों को कत्ल कर दिया।
दाहिर की वे दोनों कन्याएं और अन्य सैकड़ो हिंदू नारियाँ जो उनके हाथ लगी दासी बनाकर ले जाए गई।
हिंदुओं की धन-संपत्ति की लूटपाट, नगर को जलाना और कत्लेआम बे रोक-टोक चलते रहे।
यह दुर्दशा केवल राजधानी की ही नहीं अपितु सिंधु प्रदेश में घुसते समय जो जो नगर ग्राम मुसलमान के मार्ग में पड़े सभी की हुई।
◆ भारतीय इतिहास के छह स्वर्णिम पृष्ठ- वीर सावरकर।
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