गृह में वीरता और रणक्षेत्र में सटक सीताराम।



केतकी सिंह ने ग़लत किया। 

बिना ट्रेनिंग दिए ट्रेनर बना कर फील्ड में उतार देने से यही परिणाम मिलता है।

परंतु केतकी सिंह से पाग की रक्षा हो गई हो तो कृपया इधर ध्यान देंगे-

१. झंझारपुर में चौपाल तरुण की नृशंस हत्या मुसलमानों द्वारा कर दी जाती है।
२. अलीनगर में ही यादव बच्ची को मुसलमान उठा ले जाता है।
३. हरलाखी में विवाहित दलित युवती का मुसलमानों द्वारा मान मर्दन होता है।
४. दरभंगा सदर में राम बारात पर मुसलमानी भीड़ द्वारा पत्थरबाजी होती है।
५. बेनीपट्टी में मुसलमान ता-जबरदस्ती हिन्दू घर में घुस जाता है।

कितने गिनाऊँ!

इन घटनाओं के समय मिथिला का मान, मिथिला का सम्मान, मिथिला की प्रतिष्ठा, मिथिला का पाग जब उछाला जा रहा होता है तब हमलोग कहाँ सोए रहते हैं! उन परिस्थितियों में हमें साँप क्यों सूंघ लेता है, तब हम रण में उतरने को प्रस्तुत क्यों नहीं होते?

इस पर भी थोड़ा सोचा जाए देवियों और सज्जनों।

अपने भीतर की कुंठा से बाहर निकलेंगे तो आँखों के उपर हीनता बोध का जो पर्दा पड़ा है वह हटेगा और देख पाएंगे कि शत्रुदल किस तैयारी में है!

स्वयं को स्वयं का शत्रु मत बनाइए। असल शत्रु को पहचाने 


जिस दिन इनकी स्थिति मजबूत होगी उस दिन किसी के माथे पर पाग नहीं बचेगा और उस स्थिति का कारण केतकी सिंह नहीं होगी!

उसका कारण होगा हमारी-आपकी प्रवृति-

गृह में वीरता और रणक्षेत्र में सटक सीताराम।

आभार:-Rajesh Kumar Jha 

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